
अंत करो आतंक का,जन जन हैं बेहाल।
विघ्न हरो विघ्नेश जी, सुंदर हो यह साल।।
धूप-छाँव की ज़िंदगी, पग-पग माया जाल।
क्रोध-घृणा-नफरत सभी,बन जाते हैं काल।।
प्रेम-नेह के मेह को,ईश्वर सब पर डाल।
विघ्न हरो विघ्नेश जी, सुंदर हो यह साल।।
घटना अगणित घट रही,दिया हिंद को पीर।
चहुँदिसि अब तो ढोंग है, हृदय रहा है चीर।।
कोई अपना अब नहीं,थामों अब जगपाल।
विघ्न हरो विघ्नेश जी, सुंदर हो यह साल।।
कह दो सबको अलविदा,जो पथ के प्रतिरोध।
करता यही विनाश है,कहता है हर शोध।।
मोह-लोभ जो हो विदा,रूप न हो विकराल।
विघ्न हरो विघ्नेश जी सुंदर हो यह साल।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




