
पहली पाती रूक्मणि लिखतीं,केशव प्यारे आओ।
प्रीति हृदय की जुड़ी तुम्ही से,प्रीति नहीं ठुकराओ।।
भ्रात-पिता शिशुपाल चुने हैं,मगर न मैं स्वीकारूँ..
पिय तुमको माना इस उर ने, संग मुझे ले जाओ।
गौरी मंदिर मैं जाऊँगी,पिय !ले पूजा थाली,
वहीं मिलूँगी तुमको प्रियवर,प्रीति नहीं बिसराओ।
नाम श्याम का बिन देखे ही,बनी-हृदय की माला,
अब तो केशव लेने आओ, प्रीति-पुष्प पहनाओ।
प्रीति-पत्र में प्रेम सुवासित,शब्द-शब्द महका है,
प्रीति-मेह बन कर छा जाओ,तन-मन को भीगाओ।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




