साहित्य

ग़ज़ल

चनरेज राम अम्बुज

हक़ीम-ए-हुस्न का अपने को तलबगार भी रख।
मिलन की चाह में दिल को जरा बीमार भी रख।

अगरचे   तुमको   भी  तलवार  से  महब्बत  है,
तो ज़ख़्म के लिए  खुद को यहाँ तैयार भी रख।

बना के रखना  जमाने  में  गर जो  रिश्तों  को,
हिसाब ज़ख़्म का अपने  जरा  उधार  भी रख।

अगर  तू  चाहता  है  सुख  ओ चैन  से रहना,
तो जालिमों  में खुदी नाम को सुमार भी रख।

शरीफ़ों  का  न  गुज़र  जालिमों  की  बस्ती में,
गुलों के साथ में *अम्बुज* कुछेक ख़ार भी रख।

चनरेज राम अम्बुज

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