साहित्य

गतिस्त्वम् महा माॅं (काव्य)

समीक्षक- रमेशचन्द्र द्विवेदी

मातृशक्ति को समर्पित काव्य ग्रन्थ

कृतिकार – अखिलेश कुमार शर्मा
 प्रकाशक -ईथोस सर्विसेज हल्द्वानी -नैनीताल
प्रकाशन वर्ष -2026 (प्रथम संस्करण)
कृति का मूल्य – 250/- मात्र
पृष्ठाॅंकन संख्या – 250 (आवरण अतिरिक्त)

कवि अखिलेश कुमार शर्मा हिन्दी साहित्य
जगत् में समादृत सुपरिचित नाम है। *गतिस्त्वम् महा माॅं* उनकी प्रथम प्रकाशित काव्यात्मक कृति है । यह कृति मातृ सत्तात्मक महाशक्ति को समर्पित है। धर्म, दर्शन और आध्यात्म जब एक बिन्दु पर मिलते हैं तब जनोपयोगी साहित्य की सर्जना होती है। *यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता* की यह उक्ति इस कृति पर पूरी तरह से सार्थक सिद्ध होती है। यह कृति धर्म और दर्शन के क्षेत्र में कवि की गहन रुचि को प्रकट करती है। आदिशक्ति के रूप में अवतरित महा माॅं के परम पूज्य स्वरूप का वर्णन करते समय कवि भावों के अतिरेक में लीन हो जाता है।
सर्वप्रथम हम कृति के नामकरण पर विचार करते हैं। *भवान्याष्टकम्* में माॅं भवानी की स्तुति करते समय यह शब्द प्रथमत: प्रयुक्त हुआ है – विवादे, विषादे,प्रमादे, प्रसादे,
जले, चानले, पर्वते शत्रु मध्ये ।
अरण्ये,शरण्ये सदा माॅं प्रपाहि,
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वमेका भवानी ।।
कृति का नामकरण करते समय कवि की अन्तर्भेदी दृष्टि अवश्य वहाॅं तक परिव्याप्त हुई है। नैवेद्य निवेदित करते समय अथवा मंगलाचरण करते समय कवि समस्त देवी- देवताओं की स्तुति व वंदना करता है। माॅं शारदे, विनायक गणेश, महादेव शिवशंकर, महावीर हनुमान, श्रीराम -जानकी, सूर्य, गुरु, माॅं आदिशक्ति की वंदना ग्रंथ के प्रारम्भ में ही कवि ने किया है। माॅं शारदे की स्तुति करते हुए –
भक्ति ज्ञान वैराग्य विनय का,हो प्रकाश सर्वत्र ।
मात्र सत्य का ही दर्शन हो,और न कुछ अन्यत्र ।।
कवियों की परिपाटी और परम्परा का निर्वाह कवि अखिलेश कुमार शर्मा ने भी किया है। बाधारहित सफलता की कामना ही कवि को काम्य है। माॅं भगवती भवानी की स्तुति करते समय कवि भाव-विभोर हो जाता है –
अखंड गर्व खण्डिनी, समस्त लोक मण्डिनी ।
प्रचण्ड मुण्ड मालिनी,अनूप रूप शालिनी ।।
देवी भागवत पुराण के अनुसार माॅं भगवती आदिशक्ति स्वरूपा हैं। नव रात्रि में उनके नौ रूपों की उपासना की जाती है। वह जगत् जननी हैं। सृष्टि की उत्पत्ति की मूल कारण हैं। वह जगदम्बा हैं । परा,अपरा और पराम्बा हैं। माॅ भगवती की स्तुति करते समय कवि ने अपने विशद् ज्ञान का परिचय दिया है। परा शक्ति के रूप में परमपिता परमेश्वर चेतन स्वरूप में निखिल विश्व में परिव्याप्त हैं। आदि शंकराचार्य ने इसे अहं ब्रह्मास्मि, तत् त्वम् असि के रूप में परिभाषित किया है। परा प्रकृति भगवान से सीधे तादात्म्य स्थापित करती है। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही ब्रह्माण्ड की सृष्टि हुई है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने विस्तार से अर्जुन को समझाया है। अपरा शक्ति जड़ होती है इसके अंतर्गत -मन, बुद्धि, अहंकार, भूमि,जल वायु अग्नि और आकाश आठ शक्तियाॅं विहित है। पराम्बा- सर्वोच्च
मातृशक्ति हैं। यह शब्द परब्रह्म की इच्छा रूपी शक्ति का प्रतीक है। पराम्बा शक्ति के तीन भेद मिलते हैं-आदि परा शक्ति, सर्वोच्च देवी और शक्ति साधना। लौकिक एवं पारलौकिक शक्तियों की सिद्धि के लिए तांत्रिक साधना की जाती है। इन्हें कात्यायनी देवी कहा गया है। वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार भगवती श्री के अवतारी रूप में राधा, सीता, रुक्मिणी आदि का पराशक्ति के रूप में आविर्भाव हुआ। शैव सम्प्रदाय माॅं पार्वती अथवा शाकम्बरी देवी की उपासना परा शक्ति के रूप में करते हैं। पराम्बा शक्ति ने अपने नाखून से दशावतार की सृष्टि किया।
धर्म और आध्यात्म की विषयवस्तु क्लिष्ट है। दर्शन की चासनी मिलने से यह और भी गम्भीर हो जाता है। माॅं के विविध रूपों की अवतारणा करते समय कवि ने इसका उल्लेख किया है। हमारे वेद-पुराण -उपनिषद आदि ने माॅं की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार किया है। माता भवानी के स्तुति करते समय कवि ने कहा है कि-
करहुॅं कृपा हे !मातु भवानी,
आदिशक्ति जग की कल्याणी ।
बिना आपके मुक्ति अगम है,
भक्ति ज्ञान भी कहाॅं सुगम है ।।
सर्वोच्च देवी दुर्गा, पार्वती और भगवती के रूप में पूज्य हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार माॅं भगवती ही जीवात्मा को बंधन से मुक्ति देती हैं। कवि प्रार्थना करते हुए कहता है कि-
बिना आपकी कृपा न सम्भव,ज्ञान मोक्ष आलोक।
जबतक जीता जीव भटकता, रहता है त्रयलोक।।
भक्ति के नौ प्रकार हैं। जिसे नवधा भक्ति कहा जाता है। मानस ने गोस्वामी जी ने इसका विशद् वर्णन किया है। दास्य भाव की भक्ति सबसे उत्तम मानी गई है। माता से जब पुत्र का नाता जोड़ जाता है तो वह भक्ति का सर्वोत्तम रूप बन जाती है। कवि श्रद्धापूर्वक कहता है कि-
जैसे भी माॅं येन-केन विधि,
पराभक्ति का योग मुझे दो ।
विनय विवेक विरति को देकर,
वह सद्ज्ञान सुयोग मुझे दो ।।
संत कवि कबीर जी ने भी हरि को जननी के रूप में स्वीकार किया है –
हरि जननी मैं बालक तोरा,
काहें न अवगुन बकसहुॅं मोरा ।।
समीक्ष्य ग्रंथ से कवि का विशद् ज्ञान परिलक्षित होता है।दो सौ पचास पृष्ठों में विस्तारित विभिन्न काल खंडों में स्रजित एक सौ सत्तर रचनाऍं इस कृति में संकलित हैं। यह आश्चर्य की बात है कि सभी रचनाऍं मातृशक्ति से संबंधित और समर्पित हैं। कवि की तत्वान्वेषी दृष्टि उनके वृहद् अध्ययन का संकेत देती है। छंदों की बहुलता है। दोहा, घनाक्षरी, चौपाई, कवित्त आदि छंद कवि को विशेष प्रिय है। कवि की तार्किक दृष्टि माता-पिता के सम्बन्धों में श्रेष्ठता स्थापित करते हुए कहता है कि-
पहले माॅं है पिता बाद में,माॅं बिन पिता अशक्त ।
मातृशक्तिमत्ता ही पूजित, करती है अव्यक्त ।।
भाग्य और पुरुषार्थ की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कवि भी साफगोई के साथ अपनी बात नहीं रख पाते हैं। कवि की स्पष्ट मान्यता है कि-
भाग्यहीन है वही व्यक्ति,
मुख मोड़ लिया जिसने तुमसे ।
समझ नहीं पाया जीवनभर,
क्या कुछ चूक हुई मुझसे ।।
संसार को देखने की दृष्टि भिन्न हो सकती है किन्तु उसका आधार एक है -वसुधैव कुटुम्बकम् ।
कवि की समरस दृष्टि सामाजिक समरसता का संचार करती है। एक व्यापक सत्ता है जो संसार की समस्त गतिविधियों को संचालित एवं नियंत्रित करने का काम करती है। एक द्रष्टांत देखिए-
यह सारा ही जग कुटुम्ब सा,
लगता सुख का सार ।
भाव एक व्यापक है सत्ता,
बनता जग का आधार ।।
गोस्वामी तुलसीदास की तरह से कवि भी युगल भक्ति का वरदान चाहता है। एक याचक की मुद्रा में वह परमात्म शक्ति से याचना करता है। इसमें दीनता और विवशता भरी हुई है। यह विनय भावना की पराकाष्ठा है। एक उदाहरण ही इसके लिए काफ़ी है –
तुम चाहो तो युगल भक्ति दे,
मुझको पावन कर दो ।
तुम चाहो मानस की मरुता,
को सावन से भर दो ।।
प्रेम और समर्पण की भावना समीक्ष्य ग्रंथ में एक समान प्रवाहित होती है। *क्या कहूॅं कुछ कह नहीं सकता मगर* शीर्षक से प्रस्तुत सुदीर्घ कविता में कवि मन के भावों को उड़ेल कर रख देता है। समस्त देवी-देवताओं के साथ माता -पिता, गुरु-ज्ञानी, देव-द्विज, ऋषि-मुनि, ग्रह-नक्षत्र, आर्य-अनार्य सभी का स्मरण करते हुए श्रद्धावनत होकर काव्य-पुष्प समर्पित करता है। समर्पण की यह भावना विरले ही कवियों में पायी जाती है –
कविता पुष्पों का संग्रह यह,
अर्पित श्री चरणों में ।
करता हूॅं स्मरण नमन वंदन,
इन मधुर क्षणों में ।।
समीक्ष्य कृति का कलेवर अत्युत्तम है। मातृशक्ति के अंक में बैठा हुआ शिशु इसको भव्यता प्रदान करता है। त्रुटिहीन प्रकाशन के लिए प्रकाशक और मुद्रक साधुवाद के पात्र हैं। इस ग्रंथ का प्रणयन करते समय सम्पादक ने बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है। धर्म और आध्यात्म में रुचि रखने वाले हिन्दी के पाठकों के लिए यह ग्रंथ पठनीय एवं संग्रहणीय है। प्रस्तुत ग्रंथ की समीक्षा लिखते समय मैंने प्रत्येक बिन्दु को समाहित करने का प्रयास किया है। इस ग्रंथ में अपने अनुभूतियों को समेटने के लिए कवि श्री अखिलेश कुमार शर्मा जी
को मैं श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए हार्दिक आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करता हूॅं।
*शुभास्तु ते पंथान:*

नोट:- यह समीक्षा मौलिक, स्वलिखित एवं समीक्ष्य कृति पर आधारित, अप्रकाशित है।

समीक्षक
रमेशचन्द्र द्विवेदी
पूर्व प्रधानाचार्य
हल्द्वानी-नैनीताल
सम्पर्क सूत्र:- 8077375937

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