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हंसी ठहाके गुम अब रिवाज है झूठी मुस्कान का।
स्वार्थी रिश्ते आदमी निभाता देख नफा-नुकसान का।।
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निस्वार्थ निश्चल प्रेम-स्नेह अब पुरानी बात हो गए।
आदर आशीर्वाद से भरे पुराने जज्बात कहीं खो गए।।
आज गुजारा नहीं है दुनिया में अब आदमी नादान का।
हंसी ठहाके गुम अब रिवाज है झूठी मुस्कान का।।
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किसी के सामने झुकने का रिवाज अब खत्म हो गया।
कोई बात मनवाने का वो अंदाज अब खत्म हो गया।।
संवेदनाओं पर तो आजकल राज हो गया सुनसान का।
हंसी ठहाके गुम अब रिवाज है झूठी मुस्कान का।।
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रिश्ते निभाने के सारे हुनर आजकल बेकार हो गए।
अब दूर से ही मुंह फेरने वाले भी मिलनसार हो गए।।
सच का तिरस्कार आज रिवाज हो गया जहान का।
हंसी ठहाके गुम अब रिवाज है झूठी मुस्कान का।।
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समय पर कोई सहयोग बात अब पुरानी हो चुकी है।
दूसरों का दर्द बांटने की बात अब बेमानी हो चुकी है।।
आज आदमी चाहता सब मिले जमीन आसमान का।
हंसी ठहाके गुम अब रिवाज है झूठी मुस्कान का।।
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।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।



