
पक्षी तक गणतंत्र दिवस पर
नभ में चहक रहे।
स्वार्थ के वशीभूत कई खग
नाहक बहक रहे।
पेड़ों पर बैठी कोयल भी
जन-गण-मन गाए।
मोर नाचते जंगल-जंगल
दादुर हर्षाए।
जहाँ वृक्ष पर लदे फूल भी
लक-लक लहक रहे।
चन्दन पर लिपटे रहते हैं
विषधर बड़े-बड़े।
सीधे पेड़ों के पैरों पर
हैं किसके जबड़े?
टुकड़े-टुकड़े को आमादा
वहशी दहक रहे।
अन्य देश के व्यथित परिंदे
भारत में आते।
शांति खोज करते जीवन में,
अमन-चैन पाते।
विश्व बंधु के पुरा-पहाड़े
घर-घर महक रहे।
*-लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’*




