साहित्य

हे गांधी

संजय मृदुल

तुम उस निशान की तरह हो
जो कुंए की जगत पर
रस्सी के अनवरत घिसने से
बन गई है।
कितना भी प्रयास किया जाए
मिटाने का तुम्हें
और, और भी गहरे होते जाते हो तुम
ना कोई औजार, ना केमिकल
ना कोई रंग बना आज तक
जो मिटा दे नामो निशान तुम्हारा।
तुम इस कुंए की पहचान हो
तुम्हें मिटाने के लिए
पाटना होगा इस कुंए को
या ढहाना होगा इसे
लेकिन ऐसा करते ही
जाने कितने प्यासे रह जायेंगे
तुम्हें खतम करने के फेर में
इस जग में सूखा ले आयेंगे।
©संजय मृदुल
रायपुर

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