
हिन्दी भाषा रूप है, सचमुच मात समान।
विविध विधा औ छन्द की, हुई पड़ी है खान।।
हिन्दी सारे देश को, बाँधे है इक डोर।
करती है यह एकता, राज्य देश हर ओर।।
हिन्दी मेरे देश की, ज्यों बिन्दी हो माथ।
पूरब पश्चिम हर दिशा, लेती सबको साथ।।
पढ़ा वही जो लिख दिया,यह हिन्दी की जात।
आंग्ल भाष को देखिए, करती है बहु घात।।
कह ‘नरेश’ हिन्दी बिना, चित्त न पावै चैन।
हिन्दी भाषा को सदा, नमन करूँ दिन रैन।
✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




