
ऐ ज़िन्दगी के मुसाफ़िर!
सुन ले, ज़रा रुक जा।
ग़म को दरकिनार कर,
खुशियों का आगाज़ कर।
हर रंजो ग़म के साए में,
खुशियों का वितान है,
ज़रूरत है नज़रिया बदलने का।
ख़्वाहिशों को पूरा करने का,
हौसलों की उड़ान भरने का,
विश्वास की डोर कसे रखने का,
हिम्मत ना कभी हारने का,
फिर देखना,हाँ, फिर देखना,
खुशियों का सैलाब सराबोर कर जाएगा।।
खुशियांँ कहीं दूर नहीं,
एक चिराग ही काफ़ी होता है,
हर अँधेरे में उजाला लाता है।
देखो,खुशियों का समंदर तो,
हर उर में समाहित होता है।।
सुषमा श्रीवास्तव,
रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




