साहित्य

कितनी उम्मीदें पालते हैं

संजय मृदुल

कितनी उम्मीदें पालते हैं हम
नए वर्ष से
खुशियां, सफलता, सुख
और भी ना जाने क्या क्या

कितने संकल्प लेते हैं हम
अपनी कामनाओं को पूरा करने को
नई मंजिलें छूने को

कितना जोश होता है पहले दिन
जैसे सूर्य की पहली किरण होती है
जैसे ज्वार की पहली लहर होती है
जैसे पूनम का पूरा चांद होता है

दिन पर दिन बीतते जाते हैं
साल का हर दिन झरता जाता है
छलनी से रेत की तरह आहिस्ता
और हम गिनते रहते हैं लहरें

हर साल खुशनुमा क्यों नहीं होता
हर दिन उजास भरा क्यों नहीं होता
क्यों टूट जाती हैं उम्मीदें हर दिन
काश साल भर कोई उदास नहीं होता।

ईश्वर! क्यों हर दिन एक सा नहीं है
क्यों हर चेहरे पर खुशी नहीं है
हर घर में क्यों रौशनी नहीं है
हर हाथ में क्यों काम नहीं है

कोई बदल दे इस परिपाटी को
न बुझने दे आशा की बाती को
हर दिन हर माह हर साल सबका
चैन सुकून खुशियों से सराबोर हो

©संजय मृदुल
साथिया

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