साहित्य

कोहरे की चादर

अंजलि गोयल अंजू

कोहरे की चादर ओढ़ के
सूरज भी शरमाता है
नये साल का जश्न देखने
छिप-छिप बाहर आता है

जाड़े ने ले ली अँगड़ाई
सबको आँख दिखाता वो
सूरज को सहमा सा देखके
कट-कट दाँत बजाता वो
चंदा भी तारों सँग जाकर
दूर कहीं छिप जाता है
नये साल का जश्न देखने
छिप-छिप बाहर आता है

कोई होटल कोई पिक्चर
कोई क्लब में जाता है
कोई घर में यारों सँग कोइ
बाहर मौज मनाता है
अर्धरात्रि दिन सी लागे, ना
तम से मन घबराता है
नये साल का जश्न देखने
छिप-छिप बाहर आता है

अपनी छुट्टी का सब बच्चे
पूरा लुफ्त उठाते हैं
नये साल का सेलेब्रेशन
मिल कर खूब मनाते हैं
कोरोना का खौफ छोड़,अब
हर कोई मस्ताता है
नये साल का जश्न देखने
छिप-छिप बाहर आता है

अपने देश की संस्कृति जो
सबको गले लगती है
देशी हो या पर्व विदेशी
सब त्यौहार मनाती है
बड़े प्यार से दुनिया पे ये
अपना रंग चढ़ाता है
नये साल का जश्न देखने
छिप-छिप बाहर आता है

कोहरे की चादर ओढ़ के
सूरज भी शरमाता है
नये साल का जश्न देखने
छिप-छिप बाहर आता है

अंजलि गोयल अंजू
किरतपुर, बिजनौर
उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!