
इधर नफरतें जस की तस हैं उधर भला क्या हाल सुनाओ,
कब चाहत के फूल खिलेंगे, आने वाले साल सुनाओ।
बिखरे हैं हर एक कदम पर छल प्रपंच के शूल नुकीले,
पुष्प सुगंधित हुए नदारद लदे शाख पर फल जहरीले,
क्या उस ओर सहेजे तुमने खुशियों के जयमाल सुनाओ,
कब चाहत के फूल खिलेंगे, आने वाले साल सुनाओ।
राम लबों पर, किन्तु जहन का किला क्रूर रावण ने जीता,
मन अशोक वाटिका जहां पर बंधक बना रखी है सीता,
पीड़ा हरने आएंगे कब अवधपुरी के लाल सुनाओ,
कब चाहत के फूल खिलेंगे, आने वाले साल सुनाओ।
टूट चुके सब सेतु प्रणय के सब मतलब के साथ मिले हैं,
दो भाई ऐसे मिलते हैं जैसे दिन और रात मिले हैं,
राम-भरत सा मिलन दिखेगा कब फिर से दिग्पाल सुनाओ,
कब चाहत के फूल खिलेंगे, आने वाले साल सुनाओ।
अब सुग्रीव विभीषण जैसे मित्र किताबों की बातें हैं,
कुटिल पुत्तिका जैसे जिसके साथ उसी को खा जाते हैं,
नेह बदरिया बरसेगी क्या भर जाएंगे ताल सुनाओ,
कब चाहत के फूल खिलेंगे, आने वाले साल सुनाओ।
© आलोक मिश्र “दीपक”
शाहजहांपुर




