
मातृवत् ही यह क्षिति,
धारण करे इंसान को,
यह जमीं वह शै है जो,
पाला करे इंसान को।
जिन्दगी भर गोद में,
अपनी खिलाती है सदा,
और गोद में ही है सुलाती,
मौत पर इंसान को।
इस क्षिति के ही लिये,
कई कत्ल होते रात दिन,
भाई को भाई का रिपु,
कर देती है इंसान को।
कुछ लोग हैं दो गज जमीं,
जिनको नसीबां है नहीं,
कर देती मालामाल है,
यह ही मही इंसान को।
इस ज़मीं को आज तक,
कोई पचा पाया नहीं,
है निगलती ही धरा है,
बस फकत इंसान को।
नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




