
माघ मेला आ गया, खुशियाँ छा गयी। प्रयागराज की धरती पर टोला मोहल्ला सब भागा चला आ रहा है।आनन्ददायिनी माहौल है। हर कोने-कोने से रेला चला आ रहा है। भीड़ में बड़की अम्मा गठरी सिर पर रखे गंगागीत गाते हुए दनादन भगी चली जा रही हैं।

बाप रे बाप ! बड़ा भीड़ है। चारो तरफ आदमी ही आदमी दिख रहा है। लाल-लाल गेरूआ वस्त्र पहने साधु संतों की टोली में गंगा मइया अत्यंत सुशोभित हो रही हैं। एकदम जगामग है। लाइटों का जाल बिछा है। व्यवस्था एकदम दुरुस्त है।
सच में रात में मेले का दृश्य बेहद शानदार होता है। टेंटों का शहर बन जाता है। स्नान पर्व एक माह चलता है। भयंकर ठंड में एक डुबकी। सम्पूर्ण पाप का विनाश कर देता है। एक भक्तिमय माहौल होता है। साधु संतों के पंडालों में चल रहे भक्तिमय भाव का प्रवचन बेहद शान्ति प्रदान करता है।
एक से एक प्रदर्शनी दिख रही है। पूरा हिन्दुस्तानी रंग में सजा है टेंटोवाला शहर। हर प्रांत के लोग। देशी के साथ विदेशी भी भारतीय संस्कृति के रंग में सने हुये हैं। एक बेहतरीन अंदाज, एक पारम्परिक झलक, मंदिरों में बज रहे घंटे, चारो तरफ गंगा मइया की जयकारा।
भारतीय विरासत को दर्शाती यह माघ मेले का पर्व भारतीयों के तन मन में बसा है जिसको भारतीय लोगों के दिल से अलग नहीं किया जा सकता है। प्रयागराज का यह माघमेला भारतीय दर्शन को भी संजोये है। वास्तव में इस मेले के दृष्य को एक आनन्ददायिनी दृष्य कहा जा सकता है।
…….. जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




