
मैं और मेरा काव्य ….,
मैं कौन हूँ
क्या ,पहचान है मेरी
यही की …,मैं
शब्दों की पिरोयी गई माला हूँ
जिसमें
है ,तराना -मन के भावों की
किसी के मिलन की
या , वियोग की
क्या ,यही पहचान है मेरी …?
मैं और मेरा काव्य ,
जो रहते हैं सदा संग हमारे
जीवन के हर मोड़ पर
सुख में भी -दुःख में भी
मन के अन्तस से निकले उद्धगार -जो
लेती है शक्ल एक खूबसूरत सी कृति का
और …,
सँवारती है जीवन के उतार चढ़ाव को
शब्दों की डोर से ,
मैं और मेरा काव्य …., ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेरा बस्सी मोहाली, पंजाब




