
बसंत पंचमी
लो फिर आ गई
मां सरस्वती
तेरा जन्म पर्व है
तुम क्यों नहीं आती
लभ तो दस्तक दे मां
तेरे इस धरा पर
देख न कैसे लोगों ने
कोहराम मचा रखा है
मैं हूं , बस मैं हूं
क्यों नहीं समझती मां
यह दुनिया वो नही
तुम हो , तुम हो तो
धरा,गगन,जल हवा पानी
सब कुछ है और
दुनिया सुख सुकून से है
तेरे आशीष बिना
ज्ञान और विवेक बिना
सब कुछ व्यर्थ है मां
अच्छा तो यह है
मां सरस्वती
आज भी करोड़ों लॉग है
दुनियां में जो संवेदनशील है
मानवीय सोच और चिंतन लिए
जी रहे हैं
दया,करुणा है
शायद यही वजह है मां
यह दुनिया चल रही हैं
वरना दुनियां का
हर इंसान
अपना झंडा ले
खड़ा हो जाए और
मैं हूं,मैं हूं
का शोर मचाने लगे तो
सोचो मां क्या होगा
सिवा महा पतन के
खैर तुम हो
मेरे पास साथ
मेरे जेसे सैकड़ों के साथ
जो सब कुछ जानती है
दुनियां में जीना है तो
केवल प्यार और प्यार चाहिए
दुनियां में शांति चाहिए तो
केवल प्यार और प्यार
तब यह दुनिया चल रही है
वरना दुनियां का मानव मात्र
जिस दिन यह सोचने लगा
मैं हूं
मुझ से धरा है
मुझे से सुख सुकून है
उस दिन क्या होगा मां
मुझ से ज्यादा तुम
जानती हो
बस तेरा आशीष बना रहे
उन से पर जो जानते है
मानवीयता, संवेदनशील ओर
मानव मात्र पशु पक्षी सभी प्राणियों के लिए,
सुख,सुकून हो
वरना दुनियां में सभी
अपनी अपनी झंडे लेकर
मैं का शोर मचाने लगे तो
राम जाने क्या होगा
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




