साहित्य

मैं तेरी आँखों से

कवि संजय कुमार

मैं तेरी आँखों से,रुख़सत होकर किधर जाऊंगा।
नजर फेर के देख लेना, हर नजर में नजर आऊंगा।।

मुहब्बत का राग हैं ऐ मेरे हमसफ़र,मोहब्बत से सुना जाऊंगा।।
दिल में बसी तस्वीर तेरी,फिर भी तेरा दीदार करने आऊंगा।।
मैं तेरी आंखों से, रुख़सत होकर किधर जाऊंगा।।

ढूंढना मुझे जमीन में, मैं आसमान से बरस जाऊंगा।।

दिल से निकलने की तेरी अदा,अपने दिल को कैसे समझाऊंगा।
नादान है दिल मेरा,जो प्यार समझ बैठा उसे, खुद को कैसे बतलाऊंगा।।

मैं तेरी आँखों से, रुख़सत होकर किधर जाऊंगा।
बिछड़ गया मैं जो तुझसे, सच में मर ही जाऊंगा।।

संभाल लेना अपनी विरासत को,मैं अपना हक भी तुझें दें जाऊंगा।
आँखें होंगी उसकी, देख लेना उन आँखों में ही नजर आऊंगा।।
मैं तेरी आँखों से, रुख़सत होकर किधर जाऊंगा।।
जिन्दा रहा अगर तो तेरी गलियों का राहगीर बन जाऊंगा।।
कवि संजय कुमार – (आगरा उ.प्र)

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