साहित्य

मातृभूमि (गीत)

आशा बिसारिया

खुशबू सिमट के आ गयी सारे जहान की
मिट्टी महक रही है हिन्दोस्तान की
मिट्टी…..
पर्वत की चोटियों से ,वो झांँकता सवेरा
प्रमुदित हुईं दिशाएँ औ’जग हुआ सुनहरा
खिड़की खुली हो जैसे हीरों की खान की
मिट्टी………
कल-2वो बहती गंगा,छल-2,ये बहती जमुना
मस्ती भरे किनारे , जन्नत से लगते कम ना
पावन करें शिराएँ ,तन,मन औ’प्रान की
मिट्टी….
केसर की क्यारियाँ हैं , कहीं देवदार ऊँचे
फूलों की घाटियाँ है ,मखमल के हैं गलीचे
हममें कहाँ है हैसियत,इनके बखान की
मिट्टी…….
गौतम,सुभाष,गाँधी , ऐसे हैं लाल जिसके
आजाद,भगतसिंह से ,उन्नत हैं भाल जिसके
बिंदिया चमक रही है,झाँसी के नाम की
मिट्टी……..
आशा बिसारिया
चंदौसी(संभल उ.प्र.)

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