
एक कविता / वीरता की
#मेरे इतिहास को मुझ तक रहने दो, महाराणा
मेरे इतिहास को मुझ तक रहने दो, महाराणा,
ये तलवारें झुकी नहीं थीं, ये गर्दनें झुकी नहीं थीं।
जो समझे थे मेवाड़ को जागीर अपनी,
उन मुगलों को बता दिया—यहाँ आत्मा बिकती नहीं थी।
सोने की थाली ठुकरा दी तुमने,
माटी की रोटी को मान बनाया।
अकबर की शान को ललकार दिया,
वन-वन फिर कर भी स्वाभिमान बचाया।
हल्दीघाटी गवाह है आज भी,
जब लहू ने केसर का रंग लिया।
चेतक की टापों ने इतिहास लिखा,
जब मौत ने भी पीछे हटना सीख लिया।
जो आए थे फौजों का घमंड लिए,
वो लौटे थे हार की खामोशी में।
मुगलिया ताज काँप उठे थे,
एक राणा की अडिग सी चुनौती में।
न तुमने सलाम किया, न सौदा किया,
न दीन बदला, न धरती छोड़ी।
राजपूती आन की खातिर तुमने,
हर सांस रणभूमि से जोड़ी।
ये युद्ध सिंहासन के नहीं थे,
ये युद्ध थे आत्मसम्मान के।
तुम अकेले ही काफी थे महाराणा,
हर साम्राज्य के अभिमान के।
जो कहते हैं इतिहास विजेताओं का होता है,
उनसे कह दो—महाराणा भी इतिहास हैं।
पराजित होकर भी जो अमर हुआ,
वो केवल प्रताप हैं, वो केवल प्रताप हैं।
मेरे इतिहास को मुझ तक रहने दो, महाराणा,
इसे झूठे ताजों से मत तौलो।
ये शौर्य की वो अग्नि है,
जिसे सदियों तक कोई बुझा न सको।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



