
मकर संक्रांति भोजपुरी अंचल के एगो अत्यंत पावन, लोकधर्मी आ जीवन से गहिरा जुड़ल परब ह। ई परब खाली पंचांग के तारीख भर ना, बल्कि प्रकृति, संस्कृति आ समाज के आपसी रिश्ता के प्रतीक ह। एह दिन सूर्य देव धनु राशि से निकल के मकर राशि में प्रवेश करत बाड़ें, जवन “उत्तरायण” के शुरुआत माने जाले। मान्यता बा कि उत्तरायण के समय देवता जाग जालें आ एह काल में कइल गइल दान-पुण्य के फल कई गुना बढ़ जाला।
भोजपुरी समाज में मकर संक्रांति के बहुत मान-सम्मान बा। एह दिन के भोर में ही लोग नदी, पोखरा, तालाब भा कुआँ पर स्नान करे जाला। गंगा, सरयू, घाघरा जइसन नदी किनारे एह दिन मेला के रूप ले लेला। स्नान के बाद सूर्य देव के अर्घ्य देल जाला आ “ॐ सूर्याय नमः” के जाप कइल जाला। एह दिन तिल, गुड़, चावल, उड़द दाल, घी, कंबल आ वस्त्र के दान के बहुत महत्व बा। मानल जाला कि एह दान से पाप कटेला आ जीवन में सुख-समृद्धि के आगमन होला।
मकर संक्रांति के भोजपुरी नाम “खिचड़ी” भी बा। एह दिन हर घर में खिचड़ी पकावल जाले। चावल आ दाल के सादा पकवान खिचड़ी, एकता आ सादगी के प्रतीक ह। एह खिचड़ी के साथे तिल-गुड़ के लड्डू, लाई, चूड़ा-दही, गजक, रेवड़ी आ मिठाई खावल जाला। तिल आ गुड़ शरीर के गरमी देला, जवन ठंडा मौसम में बहुत फायदेमंद मानल जाला। “तिल-गुड़ खाईं, मीठ-मीठ बोलीं” जइसन कहावत एह दिन के सामाजिक संदेश देले बिया—आपसी कटुता छोड़ के मिठास अपनावे के।
भोजपुरी अंचल में मकर संक्रांति पर लोकजीवन अपने चरम पर होला। गाँव-गाँव मेला लगे ला, जहाँ खिलौना, मिठाई, लकड़ी के सामान आ लोककलाकारी के चीजें बिके लें। लइका पतंग उड़ावे लें, छत पर हंसी-ठिठोली गूँजे ला। महिलाएँ फगुआ आ सोहर के सुर में लोकगीत गावे लें, जवन वातावरण के और रंगीन बना देला। कहीं-कहीं कुश्ती, कबड्डी आ पारंपरिक खेल के आयोजन भी होला।
ई परब सामाजिक समरसता के मजबूत करे ला। मकर संक्रांति के दिन जाति, वर्ग आ आर्थिक भेदभाव कुछ देर खातिर मिट जाला। अमीर-गरीब, छोट-बड़ सब एक साथे खिचड़ी खा के परब मनावे लें। गाँव के बुजुर्ग आपन आशीर्वाद देलें आ लइकन में संस्कार के बीज बोवे लें। ई परब नई पीढ़ी के आपन संस्कृति से जोड़े के काम भी करे ला।
मकर संक्रांति कृषि जीवन से भी जुड़ल बा। एह समय फसल कटाई के मौसम होला। किसान आपन मेहनत के फल देख के खुश हो जालें। भगवान से अन्न, पानी आ धरती खातिर आभार प्रकट कइल जाला। एह परब के माध्यम से प्रकृति के साथे संतुलन बनाके चले के सीख मिलेला।
असल में मकर संक्रांति भोजपुरी संस्कृति के उजास ह। ई परब सिखावे ला कि जीवन में बदलाव प्राकृतिक ह, आ हर बदलाव के साथे नया उजाला आवेला। प्रेम, दान, सद्भाव आ लोकपरंपरा के एह पर्व से समाज के जड़ मजबूत होला। मकर संक्रांति के मिठास, भोजपुरी जीवन के मिठास ह—जवन पीढ़ी दर पीढ़ी बहत जा बा।
(लेखक दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के संस्थापक/समूह सम्पादक हैं।)



