
मौनी अमावस्या सनातन संस्कृति के महानतम और अत्यंत पुनीत पर्वों में एक अतिविशिष्ट पर्व है, जो माघ मास के कृष्णपक्ष की पंद्रहवीं तिथि—अमावस्या—को मनाया जाता है। माघ मास में पड़ने के कारण इसे माघी अमावस्या भी कहा जाता है। यह पर्व केवल कर्मकांडीय आस्था का विषय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और अंतश्चेतना के जागरण का विराट अवसर है।
इस पावन तिथि पर पवित्र नदियों, सरोवरों और तीर्थों में स्नान, दान तथा तर्पण करने से जहाँ एक ओर पितृदोष का शमन होता है, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति के भीतर नवीन संचेतना का संचार होता है। यह संचेतना मानसिक अवसाद, कुंठा और निराशा को क्षीण कर जीवन में नई स्फूर्ति का संचार करती है। विशेषतः प्रयागराज स्थित गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के त्रिवेणी संगम में इस दिन स्नान और दान करने से सात पीढ़ियों तक पितृ संतुष्ट होते हैं—ऐसी शास्त्रीय मान्यता है। कहा गया है कि इससे मनुष्य भवबंधन से मुक्त होकर समस्त प्रकार के पापों से निवृत्ति प्राप्त करता है।
वेदों और शास्त्रों में चंद्रमा को “मनसो जातः” कहा गया है—अर्थात चंद्रमा मन का अधिष्ठाता है। अमावस्या की तिथि मन के क्षय और अंतर्मुखता का प्रतीक मानी गई है। यही कारण है कि यह तिथि आत्ममंथन और मनोनिग्रह के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। वेद मन की शुद्धि को सर्वोपरि मानते हैं।ऋग्वेद कहता है—
“मनः पुनातु भुवनस्य गोपाः।”
अर्थात मन स्वयं को पवित्र करे, क्योंकि वही समस्त भुवनों का रक्षक है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को मन की चंचलता से अवगत कराते हुए उसे वश में करने का उपदेश देते हैं। महाभारत के युधिष्ठिर–यक्ष संवाद में मन को वायु से भी अधिक तीव्रगामी बताया गया है। इन सभी साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है, किंतु यदि मन वश में हो जाए, तो कोई भी साधना असफल नहीं होती।
इसी मनोनिग्रह और आत्मसंयम की साधना के कारण इस पर्व को मौनी अमावस्या कहा गया है। इस दिन साधक मौन धारण कर जप, तप, ध्यान और योग के माध्यम से प्रभु से तादात्म्य स्थापित करता है। वस्तुतः यह पर्व बाह्य शब्दों के परित्याग द्वारा अंतःस्थ सत्य की खोज का महापर्व है। वेद इस आंतरिक तप की महिमा का उद्घोष करते हैं।अथर्ववेद में कहा गया है—
“तपसा देवा अमृतत्वमापुः।
तपसा ऋषयो यज्ञमायन्॥”
अर्थात देवताओं ने तप द्वारा अमरत्व प्राप्त किया और ऋषियों ने तप से ब्रह्मज्ञान को प्राप्त किया। यहाँ तप में मौन, संयम और आत्मनिग्रह अंतर्निहित हैं।
पंचतंत्र में मौन की महत्ता को एक सूत्र में व्यक्त किया गया है—
“मौनं सर्वार्थ साधनम्।”
अर्थात मौन के द्वारा समस्त पुरुषार्थों की सिद्धि संभव है।
महान गणितज्ञ पाइथागोरस का कथन— “मुझे अनेक बार इस बात का खेद हुआ कि मैं बोल क्यों पड़ा”—मौन की शक्ति को उजागर करता है। स्वामी विवेकानंद कहते थे— “कभी-कभी मौन रह जाना ही सबसे तीखी आलोचना होती है; मौन क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा है।” रवींद्रनाथ ठाकुर मौन को वाणी का आश्रय कहते हैं, तो उपनिषद एकांत को प्रतिभा की पाठशाला घोषित करते हैं।उपनिषदों में मौन को मन का तप बताते हुए कहा गया है—
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
पौराणिक मान्यता के अनुसार माघी अमावस्या के दिन मनु ऋषि का अवतरण हुआ था, इसी कारण यह पर्व मौनी अमावस्या कहलाया। मनु को मानव सभ्यता का आदिपुरुष माना गया है। मौन को मुनियों की अवस्था भी कहा गया है। अतः इस दिन मौन रहकर किया गया जप, तप, स्नान और दान—मुनियों के कृत्य माने जाते हैं और इसी कारण विशेष पुण्यप्रदायी कहे गए हैं।
मौनी अमावस्या का मुख्य स्नान पर्व यद्यपि प्रयागराज के अतिरिक्त हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में भी होता है, किंतु प्रयागराज का स्थान सर्वोपरि माना गया है। यहाँ प्रत्येक वर्ष माघ मास भर चलने वाले माघ मेले का आयोजन होता है तथा प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ और बारह कुंभों के पश्चात महाकुंभ का आयोजन भी यहीं होता है। मान्यता है कि इस काल में समस्त तीर्थ, देवता, किन्नर, यक्ष, गंधर्व, ऋषि और महर्षि विविध रूपों में यहाँ उपस्थित होकर त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रयाग की महिमा का अमर वर्णन करते हुए लिखा है—
देव दनुज सुर किन्नर श्रेनी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ।
कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥
गोस्वामी जी माघ स्नान की परंपरा को रेखांकित करते हुए लिखे हैं –
माघ मकरगत रवि जब होई।
तीरथ पतिहि आव सब कोई॥
एक माह भरि माघ नहाहीं।
सकल मुनिन्ह निज आश्रम जाहीं॥
इस प्रकार मौनी अमावस्या केवल एक पर्व नहीं, बल्कि मन के परिष्कार, आत्मसंयम और ब्रह्मचेतना की साधना का महापर्व है—जहाँ मौन स्वयं वाणी बन जाता है और आत्मा अपने भीतर ही परम सत्य का साक्षात्कार करती है।
— डॉ. उदयराज मिश्र




