
पुस्तक- मैं समय हूँ
रचनाकार- दिलीप कुमार पाण्डेय
समीक्षक-
अतुल कुमार शर्मा
जब कोई साहित्यकार अपना लक्ष्य लेकर सृजन की दिशा में निकलता है, तो उसके अंदर समाज सुधार को लेकर एक मशाल प्रज्वलित होने लगती है। जैसे-जैसे वही मशाल ज्वाला के रूप में परिवर्तित होती है उससे तमाम कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण को शुद्ध करने में यही ज्वाला कारगर सिद्ध होती है। ऐसी ही एक साहित्यिक ज्वाला जनपद सुल्तानपुर में जन्मे दिलीप कुमार पाण्डेय के हृदय में धधकी, जो सन् 2021 में सर्वप्रथम “उम्मीद की लौ” के रूप में साहित्यिक जगत में सबके सामने आई और फिर इसी प्रकार वे निरंतर लेखन में सक्रिय रहे। अपने मन-मस्तिष्क को सामाजिक एवम् आध्यात्मिक चिंतन की और बढ़ाते हुए उन्होंने तमाम ऐसी कविताओं को जन्म दिया जो बुराई रूपी निशाचरों का नाश करने में समर्थ हैं।
उनकी रचनाओं में कहीं मानवीय मूल्यों के ह्रास पर चिंतन मिलता है तो कहीं सांस्कृतिक पतन एवं राजनीतिक छल से कवि का मन दुखी प्रतीत होता है। अनेक रचनाओं में जीवन की खुशियांँ भी दिखाई पड़ती हैं जो पाठक को जीवंत बनाती हैं। कवि कहीं मोबाइल के दुरुपयोग पर चर्चा करते हैं, तो कहीं बुजुर्गों के जीवन तथा गरीबी की ओर इशारा करते हैं। रोजमर्रा में देखे जाने वाले अनुभवों को भी, कवि अपनी कविता के माध्यम से प्रकट करते हैं। रचनाओं को पढ़ने के बाद यह निश्चित हो जाता है कि उनका हृदय कभी खुशियों से भरा होता है तो कहीं किसी विषय पर मिलने वाली विसंगतियों एवं उपजी कुंठाओं से भी व्यथित है।
सच्चा कवि और सच्ची कविता वही है जो अपने मार्ग में न कभी आने वाले काँटों से विचलित हो और न ही सुगंधित पुष्पों की महक से आकर्षित हो।
‘मैं समय हूंँ’ काव्य-संग्रह में रचनाकार दिलीप कुमार पाण्डेय ने, तमाम ऐसी टिप्पणियांँ अपनी कविताओं में संजोकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की हैं जो नैतिक और अनैतिक में भेद करने में सक्षम हैं। भागमभाग और प्रतिस्पर्धा के युग में एक दूसरे को धकियाने की कोशिश में लगे पूंँजीवादी समाज के समर्थक, उससे कहीं न कहीं अवश्य ही अपने भीतर बैठे निशाचर को भागने में सफल हो पाएंगे। कवि ने जहाँ एक रचना ‘नरसंहार और युद्ध’ में राजनीति के गिरते स्तर तथा लोकतंत्र के मरणासन्न होने पर अपने लेखनी को धार दी है, वहीं ‘करवट’ नामक कविता में समय किस प्रकार करवट बदल रहा है? हमारे रिश्तों में किस तरह तनाव आ रहे हैं? हमारे मस्तिष्क की रेखाएंँ संकुचित होती जा रही हैं और किस प्रकार हमारे ललाट पर चिंता की सलवटें दूर से ही दिखाई पड़ रही हैं? यह सब प्रदर्शित करने का प्रयास किया है।
कवि ने आधुनिकता की नकल न करते हुए स्वयं को सामान्य बने रहने का समर्थन भी किया है, अगर हम ऐसा करते हैं तो हमारा न ही कोई विरोधी होगा न ही हमारी जीवन यात्रा में कहीं असुरक्षा का भाव रहेगा और न ही हम खुद को थका हुआ महसूस करेंगे। भले ही इस तथ्य को विज्ञान स्वीकार नहीं करेगा लेकिन शांति की तलाश में यह कवि का अपना मत है। कई रचनाओं में कवि ने मानव मात्र को अपने विकास हेतु चरैवेति-चरैवेति का संदेश भी दिया है।
शीर्षक धारण करने वाली रचना, ‘मैं समय हूंँ’ में कवि ने पराए धन का हरण करके अपना रुतबा कायम करने वाले और दूसरों के सपनों को चकनाचूर करके अपनी ऊंँचाई बढ़ाने में लगे रहने वाले स्वार्थी लोगों को आईना दिखाने एवं सबक सिखाने के लिए भी अपनी कलम को इशारा किया है। ऊपरी चमक-धमक और अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए लोग, निरन्तर नये-नये जाल बुनकर यथार्थ से बचते हुए नजर आते हैं। लोग समाज में अपना वर्चस्व बनाने के प्रयास में कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं लेकिन वह सही राह पर चलने से निरंतर बचते रहते हैं और अंत में वही लोग इसी अहंकार में नष्ट हो जाते हैं। सच्चाई तो यह है कि आज के समाज में ऐसा एक व्यक्ति नहीं बल्कि हर व्यक्ति पाखंड और दिखावे के झूले में झूलता हुआ खुश है, उसका हृदय प्रफुल्लित है। कवि का मानना है कि आज प्रत्येक व्यक्ति विनाश के उस कगार पर खड़ा है जहांँ से कोई रास्ता नजर भी नहीं आता। ‘तस्वीर गायब है’ नामक रचना में, आम आदमी की जिंदगी की त्रस्तता के साथ-साथ कवि ने सरकारी कर्मचारियों की निष्ठुरता एवं दुर्व्यवहार को भी दर्शाया है। इस काव्य-संग्रह की गंभीरता को समझकर समय के चक्र से कौन कितना बच पाता है? कौन अपनी सही राह पकड़ पाता है? कौन अपनी दुष्प्रवृत्तियों को संस्कार में बदल पाता है? यह तो समय ही बताएगा लेकिन कवि ने अपने धर्म का पालन अवश्य किया है, इस रचनाधर्मिता के लिए दिलीप कुमार पाण्डेय जी को बहुत-बहुत साधुबाद।
समीक्षक-
*अतुल कुमार शर्मा, सम्भल*
मोबाइल- 8273011742




