
भिन्न रंग भिन्न रूप
फिर भी रहे सामानता
भिन्न-भिन्न वेशभूषा
झलके सांस्कृतिक एकता।
सूर्य ने बदला स्थान
चांद का पूर्ण पखवाड़ा
हृदय होता प्रफुल्लित
हो जाता त्यौहार हमारा।
नव वर्ष का उल्लास
परिवार करता है परिहास
जग जाती जीवन की आस
जीवन में भरता है उजास।
पौराणिक संस्कृति है हमारी
विरासत ही है धरोहर
जन्म जन्मांतर से चल रही
आस्था हमारी मनोहर।
खेत की फसलें
या हो वंश वृद्धि
हिल मिल करते मनुहार
ऐसे हमारे त्योहार।
शुरुआत तो एक है बहाना
त्यौहार खुशी से मनाते हैं
भारत देश हमारा महान
संस्कृति सम्मान करते हैं।
डॉ.पुष्पा सिंह




