
दिसम्बर है मेरा दूल्हा
देखो चला जा रहा है
शादी का निमंत्रण
खुद ही दिए जा रहा है।
इक्तीस के बारह बजे
उसकी हो रही है शादी
दूसरे समय के थे बाजे
बरात लिए आ रहा है।
जनवरी है मेरी दुल्हिन
रात बारह द्वार पर खड़ी,
साज बाज बजा रहे हैं
घराती और बराती जो हुए हैं।
शादी के मंडप में
शोर न मचाना बराती।
दुल्हिन की खुशी में
चढ़े ना तुम्हें खुमारी।
फेरे अभी नहीं है
साक्षी बन रही है
बचपन के संग साथी
सबसे अनोखी हो रही
देखो आज हमारी शादी।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




