साहित्य

नशा

शशि कांत श्रीवास्तव

ये -धुआँ भी चीज अजीब है
नशा इसका बेमिसाल है,
जकड़ता है लोगों को गिरफ्त में
धीरे -धीरे,
ये -धुआँ भी चीज अजीब है |
भूल जाते हैं लोग अपनों को
और दुनिया जहान को ,
जब…,
डूबते हैं वो इसके आगोश में,
ये -धुआँ भी चीज अजीब है |
जलती भी है और जलाती है,
गलती भी है और गलाती है,
उड़ती भी है और उड़ाती है,
उनको अपनी ही तरह
धीरे -धीरे,
ये -धुआँ भी चीज अजीब है |
करती है ये उनको खोखला
राख के मानिंद
फिर,
मिट्टी में मिलाती है संग अपने,
धीरे -धीरे,
सदा के लिए,
क्योंकि…,
ये -धुआँ भी चीज अजीब है ||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

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