
पीले वस्त्र पहन आया बसंत, देता मधुर संदेश,
धरा महकी,गगन धवल, शिशिर को भेजे परदेश।
खेत खलिहानों ने ओढ़ी पीत चुनर छाया है मधुमास,
जग में त्योहारों का मौसम, जीवन में नव उल्लास।
बासंती बयार के हल्के झोंके, मन को छूकर जाए,
शीतलता में बिखरी ऊष्मा, आलस को दूर भगाए।
कलियाँ चहकी, फूल खिले, रंगों की हुई बौछार,
प्रकृति ने खोले दिल के द्वार, छाया प्रेम अपार।
आम्र मंजरियों की खुशबू से, महक उठा बागान
फूलों पर मँडराकर भौंरों ने छेड़ी मधुर तान,
हरित धरती,धवल दिशाएँ, नभ में बिखरा उजियारा
बासंती जादू ने हर लिया, द्वेष मन का सारा।
हर उपवन में गूँजे वीणा, सुर में झूमा जहान,
ज्ञान का दीप जला करते,माँ शारदे का आवाहन।
अक्षरों से ज्ञान के दीप जले, तम का हुआ निवारण
बुद्धि-विवेक के संग, हो मानवता का जागरण।
बुद्धि बनी रोशन यहाँ, चेतना ने ली उड़ान,
संशय टूटा, सत्य मिला, सरल हुआ इंसान।
आओ हम भी पीत पहनकर,करें अहं का त्याग,
माँ शारदे को शीश झुकाकर , जगाये प्यार अनुराग।
ऋतुराज बसन्त आओ करती हूँ मैं स्वागत तुम्हारा
मधुमास में प्रकृति ने धरती को दुलहन सा सँवारा।
बसंत पंचमी के पावन दिन,लें ये संकल्प हर बार,
ज्ञान, प्रेम और आशा से, कर दें जीवन साकार।
सुमन बिष्ट, नोएडा




