
श्रमजीवी मजदूर,सूर्योदय से शाम तक।
काम करे भरपूर,जीवन गाड़ी खींचते।।
जीवन गाड़ी खींचते वही,वही परिवार चलाते।
अपना घर कभी नसीब नहीं पर,सबका सदन बनाते।।
अम्बुज उनके सद्कर्मो पर,अपना शीष झुकाता।
बार-बार उनको ही कहता,अपना भाग्य विधाता।।
जीवन में हो चाह,राहें मिलती हैं सदा।
होना मत गुमराह,आगे बढ़ते ही चलो।।
आगे बढ़ते ही चलो वहाँ,जहाँ मंजिलें तेरी।
त्याग सभी आलस्य चलो तुम,बजती है रणभेरी।।
कह कवि अम्बुज आओ प्यारे,हाथों अस्त्र उठाओ।
दुर्जन दानव बैरी जन को,जल्दी मार भगाओ।।
गुरु बिनु मिले न ज्ञान,शिष्य सभी यह जान लो।
सुनो लगाकर ध्यान,वंदन उनका कीजिए।।
वंदन उनका कीजिए सभी,सच की राह दिखाते।
कच्ची मिट्टी कूट-कूट कर,पक्का घड़ा बनाते।।
ऊपर से वह चोट मारते,नीचे से सहलाते।
मुक्ति मार्ग को वही दिखाते,गुरु जो हैं कहलाते।।
चनरेज राम अम्बुज



