
मेरे एहसास
तेरे साथ बीते लम्हों को सहेज़े रखती हूं
जब पास नहीं होते इनसे दो चार बातें कर लेती हूँ
जो तुम एक आवाज लगा देते हो
भागी चली आती हूं हर काम दरकिनार कर
वो लम्हें समेटने जो तुम संग बीतते हैं
तुम क्या जानो ये अनमोल धरोहर हैं मेरे
जो तुम बिन भी तुम्हारी उपस्थिति महसूस कराती हैं
मेरे सुकून तुम्हारे एहसास से हैं
वो क्षण जो तुम संग बैठ बनते हैं मेरे
मेरे बहुत काम आते हैं
तुम संग जो लम्हें बीते यादों में बस जाते हैं
बाकी हर लम्हें भूल जाते हैं जो तुम बिन गुजरा करते हैं
खुद को भी भूल जाती हूं
बस तुम ही तो हो जो याद रह जाते हो
बस ठहर जाती हूं एक आवाज पे तुम्हारी
हर काम दरकिनार कर भागी चली आती हूं।
तृषा सिंह
देवघर झारखंड




