साहित्य

पुस्तक समीक्षा- देवव्रत – “कालजयी योद्धा की वीरगाथा”

समीक्षक-दुर्गेश मोहन

पुस्तक समीक्षा
देवव्रत – कालजयी योद्धा की वीरगाथ
लेखक – प्रभात सिन्हा
समीक्षक_दुर्गेश मोहन
बिहटा, पटना (बिहार)
प्रकाशक – फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस
अंतः करण में उतर जाती हैं _देवव्रत_कालजयी योद्धा की वीरगाथा

कुछ कृतियाँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे अंतःकरण में उतर जाती हैं। देवव्रत – कालजयी योद्धा की वीरगाथा ऐसी ही एक अनुपम रचना है, जो महाभारत के विराट पट पर अंकित भीष्म पितामह के जीवन को नवचेतना के साथ प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ केवल इतिहास नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण की अमर गाथा है।
लेखक ने देवव्रत को किसी दैवी प्रतिमा की भाँति नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्य के रूप में उकेरा है। गंगा पुत्र देवव्रत से भीष्म बनने की यात्रा त्याग, तप और अदम्य संकल्प की कथा है। आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेते समय उनकी अंतरात्मा में उठता तूफ़ान शब्दों के पार अनुभूत होता है। वहाँ मौन भी अर्थवान बन जाता है।
भाषा इस पुस्तक का सौंदर्याभूषण है। संस्कृतनिष्ठ, पर सहज प्रवाहयुक्त। प्रत्येक वाक्य में महाकाव्यात्मक गरिमा झलकती है। संवाद इतने प्रभावी हैं कि पात्र जीवंत होकर सामने आ खड़े होते हैं। शांतनु, गंगा, सत्यवती और कुरुवंश के अन्य चरित्र अपने-अपने आयामों में उभरते हैं, किंतु केंद्र में सदैव देवव्रत की तेजस्वी छाया बनी रहती है।
यह कृति केवल युद्ध-वर्णन तक सीमित नहीं, बल्कि युद्ध से पूर्व की मानसिक पीड़ा, राजधर्म और व्यक्तिगत भावनाओं के द्वंद्व को मार्मिकता से उद्घाटित करती है। शरशय्या पर लेटे भीष्म का दृश्य करुणा और वीरता का अद्भुत संगम बन जाता है।
आज के भौतिक युग में यह पुस्तक हमें मूल्यों की स्मृति कराती है। यह प्रश्न उठाती है—क्या हम अपने वचनों पर अडिग रह सकते हैं? क्या त्याग आज भी जीवित है?
देवव्रत – कालजयी योद्धा की वीरगाथा वीरता को शस्त्रों में नहीं, चरित्र में खोजने का संदेश देती है। यह ग्रंथ पाठक को नमन और चिंतन—दोनों के लिए विवश करता है। एक ऐसी कृति, जो पीढ़ियों तक प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
समीक्षक_दुर्गेश मोहन
बिहटा, पटना (बिहार)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!