
पिया बिनु फगुआ,भइल दूभर मोहाल,
विरहिन के हियवा,उपजै मलाल।
कि गोरिया लामे खड़ल।।
बहत बसंती बयार,फगुआ करत धमाल,
यादन निरमोहिया,करत बेहाल।
कि गोरिया लामे खड़ल।।
गोरी के जियरा उठे हुक, क्लेसहि कराल,
के मली गलवा,अबीरो गुलाल।
कि गोरिया लामें खड़ल।।
हरिहर,पीयर,लाल,गुलाबी,रंगवा चटकील,
संग उड़ रहल रंग,केशर गुलाल।
कि गोरिया लामे खड़ल।।
ओसारे में ठाड़ झांके,देवरा,रंगल सियार,
बुढ़उ बाबा भी, बनलं छिनार।
कि गोरिया लामें खड़ल।।
जेठानी के अँगना,हँसी ठिठोल,होत किलोल,
केहू केहू से ना पूछै,ना करत सवाल।
कि गोरिया लामें खड़ल।।
केहू के हथवा शोभत,रंग भरल पिचकारी,
केहू क चोली भीगत,केहू क सारी।
कि गोरिया लामें खड़ल।।
फगुआ बा आइल, प्रेम रस घट बरसाइल,
राग द्वेष केहु के, ना रही मलाल।
कि गोरिया लामे खड़ल।।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” गोरखपुर
चलभाष-९३०५९८८२५२



