
संस्कारों की दीपशिखा, घर-आँगन में जलती जाए,
मातृ-वाणी, पितृ-आशीष,जीवन-पथ को सरल बनाए।
बुज़ुर्गों के चरण-स्पर्श में, झुकना ही सच्चा मान,
विनय, मर्यादा, सत्य-करुणा—यही जीवन की पहचान।
गुरु-वचनों की पावन गूँज, मन-मंदिर में बसती रहे,
कर्तव्य-बोध की दृढ़ डोरी, हर विपदा में कसती रहे।
परहित में जो सुख ढूँढ़े, वही धन्य कहलाता है,
स्वार्थ तजे जो मानवता, वह ईश्वर को भाता है।
वाणी मधुर, कर्म उज्ज्वल, दृष्टि रहे निष्काम,
संस्कारों से गढ़ा हुआ ही, बनता उत्तम इंसान।
पीढ़ी-पीढ़ी जो संजोए,संस्कृति का अमृत-धान,
वही राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य, वही सच्चा अभिमान।
श्रद्धा, शील और संयम से, जीवन का रथ जो चले,
सत्य-पथिक बन आँधियों में,दीप-सा हर पल जले।
संस्कारों की सुगंध लिए, कर्म-कमल जो खिल जाए,
वही मनुज धरती पर आकर, जीवन को सार्थक कर जाए।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




