साहित्य

शहीद दिवस

विरेन्द्र जैन माहिर

शूर भी तुम, वीर भी तुम हो, तुमसे रण की पहचान है,
सीमा पर अडिग खड़े तुमसे भारत की शान है!
हम सोए रहें चैन से, जब जागे आठों पहर जवान है,
तुम्हीं तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है! १

पश्चिम की सरहद पर जब जब साज़िश ने सिर उठाया है!
उत्तर के बर्फ़ीले मौन ने शौर्य को भी आज़माया है!
तब तब कारगिल की चोटी पर गूँजा भारत-गान है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

नापाक पाक की चाल कभी सीमा पे चीन की आंखें गड़ी,
तुमने बंदूक से पहले भारत के संयम की मर्यादा गढ़ी!
तेरे कदमों की थाप सुन कांपे दुश्मन की जान है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

जब आंख उठी सीमाओं पर, शब्द नहीं तनाव बोला,
भारत ने पहले संयम धारा, सैनिकों ने सीना खोला!
तेरे कदमों की थाप सुन कांपे दुश्मन की जान है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

ललकार नहीं, हुंकार नहीं ये मौन खड़ा जो जिगरी है,
इसके सीने में भारत धड़के, देश का भूगोल प्रहरी है!
मृत्यु का भय, न पीड़ा का डर,
बस एक ही ध्येय महान है!
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

नींद चैन से आती है, जब सरहद पर कोई जगता है,
कोई बर्फ़ में गलता है, कोई रेगिस्तान में तपता है।
मिट्टी से रिश्ता ऐसा है, जैसे साँसों से रहता प्राण है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

देशभक्ति ही धर्म है इनका, जाति हिन्दुस्तानी है,
शूरता ही वंश है इनका, वीरता में कौन इनका सानी है,
धर्म, जाति, वंश से ऊपर, एक ही पहचान है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

वर्दी में सिला हुआ मां का आशीष लिए,
गले में बांधे प्रियतमा की तस्वीर का तावीज़ लिए,
पीठ पीछे छूट गए बच्चे, सामने बस हिन्द की शान है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

जो लौटे विजयी बन सेनानी, जो सो गए अमर स्मृति गाथा हैं,
जो चुपचाप शहीद हुए, वो भारत की परिभाषा हैं,
शूर तुम, वीर तुम, देश तुम्हारा कर्ज़दान हैं,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

जब तक वर्दी में कोई सैनिक, सरहद पर मुस्काता है,
तब तक कविता ज़िंदा है, “माहिर” गीत सुनाता है।
मेरे हर शब्दों में तुम्हारे ऋण का निशान है,
तुम ही तो हो देश की ढाल, तुमसे ही हिंदुस्तान है!

विरेन्द्र जैन माहिर
वड़ोदरा गुजरात

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