
उड़ती आज पतंग, नभ में चहुँ दिशि ओर है।
सबदोस्तों के संग, मना रहे त्योहार है।।
नभ में उड़े पतंग, डोर द्वार प्रभु के पास
चलती है जब जंग, इस नश्वर संसार में।।
मकर संक्रांति बाद,भी पतंग नभ में उड़े ।
करें वर्ष भर याद,इस अनुपम आनंद को।।
बंधती हरि से डोर, पतंग सब जग है बना।
कुसमित भाव विभोर, कान्हा छवि हिय में बसे।।
पतंग देती सीख, मानव तन नश्वर बना।
मिले नहीं जब भीख, साथ सभीहैं छोड़ते।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




