साहित्य

स्व-खोज

तृषा सिंह

टूटती रही,बिखरती रही, हर सवालों को मैं ढूंढती रही
हर राह पर तकती रही,कौन हैं साथ मेरे
खुद से भागती रही, खुद में गलतियां ढूंढती रही
सन्नाटा मेरे मन का हमेशा सवाल करता रहा
सपने हजार थे, कंधें पर सपनों की लाशें ढोती रही
दर्द ने हर मोड़ पर रास्ता रोका मेरा
पर साहस का दीपक हमेशा टिमटिमाता रहा
मेरे बहते आंसुओं ने,मुझे कमजोर नहीं मजबूत गढ़ा
जिन सवालों से मैं भागती रही
उन्हीं सवालों ने ढूंढा मुझे
खुद से लड़ते- लड़ते खुद को जब समझा
कमजोरी मेरी ताकत बन गई
खामोशियों से अब डर नहीं लगता
खामोशियां ही मेरी पहचान बन गई
स्व-खोज ने सिखाया मुझे
जो टूटता हैं बिखरता हैं, वही और भी निखरता हैं।
तृषा सिंह
देवघर, झारखंड

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