साहित्य

बेसहारा

धीरज कुमार शुक्ला'फाल्गुन'

जिसने मुझे था जीवन दिया
जिसने मुझे था रोशन किया
वो अभागा मैं बन गया
जिसने बुझाया वो रोशन दिया
जिसने मुझे था अमृत दिया
उसके लिए विष मैंने भर लिया
जीवन उसी का नरक कर दिया
दुःखों के सागर में डूबो ही दिया
वो मुस्कुराहट जिससे खुश कर दिया
उसी मुस्कुराहट को मिटा ही दिया
वो कहती थी पीड़ा मुझे होती है
छोड़ दो दर्द मुझे देती है
तुम्हारे साथ प्रेम है किया
और तुमने मुझे पराया किया
एक मां के सिवा तुम ही थे मेरे
क्यों तुमने मुझे बेसहारा किया
नयनों में बहते अश्रु न दिखे
हृदय के बिखरते टुकड़े न दिखे
तड़पती रही आत्मा जब मेरी
क्यों तुमने मेरे साथ ऐसा किया
मैं होकर भी तुम्हारी तुम्हारी न रही
पास हूॅं पर पास अब न रही
सजा तुम्हारी यही है सुनो
तुम्हारे साथ जीवन न जाए जिया
जो तुमने किया अधर्म है पिया
करूंगी क्षमा न कभी कह दिया
याद रखना मेरी बात हरदम सदा

कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’फाल्गुन’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)

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