
इमली पे आईं शोखियाँ,बसन्त आ गया
झाड़ी में पकी बेरियांँ , बसन्त आ गया
इमली…….
वो लाल-लाल कोंपल,आमों पे आगयीं
बौरों से लदी डालियाँ , बसन्त आ गया
इमली……
हर ओर झूमने लगे , मदमस्त हो भ्रमर
कलियाँ हैं मय की प्यालियांँ,बसन्त आ गया
इमली……
महका गुलाब,गेंदा ,सूरजमुखी औ’ गुड़हल
पर खोलती हैं तितलियाँ ,बसन्त आ गया
इमली…..
हँसने लगे सरोवर , सूरज की रश्मियों से
हंसा करें अठखेलियाँ , बसन्त आ गया
इमली……..
जिस फूल को यह भंँवरा,भूले नहीं निहारे
उस चंपा पे भी चंपई सा , रंग छा गया
इमली……
फूला कदंब ऐसे , कन्दुक हों लटके जैसे
कान्हा के मन को भा गया,बसंत आ गया
इमली……
पीला पराग पाके , पंकज में हुआ बन्दी
फिर भ्रमर उड़ न पाया,लो बसन्त आ गया
इमली……..
रंग और अबीर उड़ता ,बादल हुए गुलाबी
यह मन हुआ शराबी , लो बसन्त आ गया
इमली…..
आशा बिसारिया चंदौसी
संभल,उत्तर प्रदेश



