साहित्य

स्वर्ण-तमगे का सन्नाटा

दिनेश पाल सिंह दिलकश

घर से निकला था जो सपनों को उठाए, न कोई,
पाँच बरस बाद भी हाल पूछ पाए, न कोई।

जेब में फ़ोन तो क्या, बात का साधन भी न था,
जीत की ख़ुशबू थी, ख़त भेजने आए, न कोई।

एम.ए. की डिग्री, गले में था स्वर्ण-तमगा,
माँ-बाप की कब्र पे दीप जलाए, न कोई।

दो सौ कोस चला, सोच के घर मेरा है,
घर पहुँचा तो वहाँ घर सा पाए, न कोई।

माँ की गोद भी न थी, बाप का साया भी न था,
सूचना दे दे ज़रा—इतना बताए, न कोई।

भाइयों ने भी उसे पानी तक न दिया,
अपने ही ख़ून को गले लगाए, न कोई।

भूख जब चीख बनी, रात जब छत ढूँढती,
पड़ोसियों ने उसे रोटी खिलाए, न कोई।

सोचता है वो कि तालीम का क्या मोल मिला,
सोने का मेडल था, माँ को दिखाए, न कोई।

दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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