साहित्य

आ गई जनवरी

बंदना मिश्रा

बीत गया दिसंबर आ गई जनवरी।
ओढ कर धुंध और कोहरे की चुनरी।
कैसे करे हम नए साल का स्वागत।
बहुत है ठंडी गजब की शीतलहरी।

हाथ पांव भी नहीं काम कर रहे है।
ओढ कर रजाई आराम कर रहे है।
हो गए है बहरे नहीं सुनते है हमरी।
बहुत है ठंडी गजब की शीतलहरी।

कहते है मुझसे भी अंदर आ जाओ।
ओढ कर रजाई तुम भी छिप जाओ।
सुन लो हमारी ना बनो अब बहरी।
बहुत है ठंडी गजब की शीतलहरी।

बंदना मिश्रा
देवरिया उत्तर प्रदेश

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