साहित्य

तल्ख़ी

राजीव त्रिपाठी

उनके मेरे दरमियांँ फ़ासला क्यों है
वह पराए होकर भी मेरे अपने क्यों है!!
वक्त के साथ इंसान भी बदल जाते हैं
गुरुर अपना होने में उनको इतना क्यों है!!
हमने तो उम्र तन्हा ही गुज़ार दी,
जो दावा करते हैं अपने होने का,
वह फिर आज पराए क्यों है!!
रात भर जब हमको नींद नहीं आती
सुबह का इंतिज़ार इतना लंबा क्यों है!!
परेशान हो गया हूं जिंदगी जीते जीते
ऐसे में फिर लोगों का बदलना क्यों है!!
पत्थरों की बस्ती है यहांँ दिल कहांँ
वह मेरी उदासी की वजह क्यों है!!
बहुत रखा है उसने दिल को पोशीदा
हमारे दिल से ही उनको खेलना क्यों है!!
मुतमइन नहीं हूं मैं उनकी बातों का
दिल को फिर उन पर भरोसा क्यों है!!
ग़ैर- वाजिब नहीं है मेरे सवाल,
मेरे सवाल पर उनकी तल्ख़ी क्यों है…

– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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