साहित्य

उम्र के उस दौर में

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

उम्र के उस दौर में आ गए हैं हम,
सबसे बेझिझक बातें अब करने लगे हैं।
परवाह नहीं करते हैं कि लोग क्या कहेंगे,
जी में आता है जो वही अब करने लगे हैं।

देखेंगे वो रंग भी, जो दुनिया हमे अब दिखाएगी।
देखेंगे मेरी तकलीफों के वक़्त कैसी रंगत तुम्हारी होगी।
ज़िन्दगी है ज़िन्दगी को ज़िंदादिली से जिएंगे।
ख़ुशियों को भी अपनाएंगे, ग़मों से भी यारी रखेंगे।

बांधकर दुपट्टे से कंधे पर लटका दीं उलझनें।
मन चाहे गानों पर अब थिरकने लगे हैं ।
क्या करना है अब धन-दौलत में पड़ कर।
बालों में सोना-चांदी अब चमकने लगे हैं।

जैसे-जैसे बढ़ते जा रहे हैं तजुर्बे अपने।
वैसे वैसे दिन जिंदगी के अब घटने लगे हैं।
जीते रहने के लिए जिंदादिली बहुत जरूरी है।
वरना लोग उम्र से पहले भी अब मरने लगे हैं।

प्यार और स्नेह की, धूप खिलती हो वफा।
हंसी के फूल खिलते, जहां दिल हो साफ।
जीवन की राहों में, साथ हो अपनों का दुलार।
दिल की गहराइयों में, खुशियों का सागर।

जिंदगी की खुशियों में, नाचते रहो यार।
जिंदादिल सदा खुश रहो, जीवन में हो प्यार।
जीवन की यात्रा में, साथ हो अपनों का हाथ।
जिंदादिल सदा खुश रहो, जीवन में हो प्यार का साथ।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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