
समय बस समय है
क्या नया क्या पुराना!
समय के भीतर सुनो
जीना और मर जाना!!
आए और फिर चले गये
गिरते पडते चढते उतरते!
आपाधापी छीनाझपटी
रुठना रुठाना इतराना!!
कहीं खुशी कहीं गम हो
कोई खुश कोई नाराज!
जो चाहा वह हुआ नहीं
विरोध में सारा जमाना!!
पुरुषार्थ फलदायी नहीं
चापलूसी विजयी होती!
जिसका जादू चल जाता
शोर उसी का चल जाना!!
वासना में आसक्त जो
उसके पास नहीं संतोष!
हाय हाय हाय चलती
नित्यप्रति बस कुंभलाना!!
सभी द्वंद्व समय भीतर
जीवन मध्य में डोलता
जो भी इससे निकल गया
जरूरत नहीं समझाना!!
समय के भीतर मरण है
परमानन्द है समयातीत!
क्षणिक शाश्वत की ओर
सांसारिक समय तर जाना!!
……….
आचार्य शीलक राम
वैदिक योगशाला
कुरुक्षेत्र




