
बंकिमचंद्र की सशक्त लेखनी से उपजा ,
यह स्वतंत्रता का अमर शंखनाद है।
वंदे मातरम्, यह केवल गीत नहीं,
भारत माँ की श्वासों का उद्गार है।
आनंदमठ के पन्नों से निकलकर ,
इसने जन-जन को जगना सिखाया।
पराधीनता की बेरहम बेड़ियाँ तोड़ने को,
देशभक्तों को पथ, बलिदान का दिखाया।
मातृभूमि को देवी रूप में देखा,
जल, जंगल, खेतों से जोड़ी पहचान।
सुजलां-सुफलां, मलयज-शीतलां,
धरा के कण-कण में बसता यह गान।
नदियों की निर्मल धारा, फसलों की हरियाली,
इस गान में भारत की आत्मा मुस्काती।
कोटि-कोटि कंठों से जब यह गूँजे,
तो रगों में बिजली सी दौड़ जाती।
1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह गान ,
देश में जन-आंदोलन की आवाज़ बना।
स्वतंत्रता सेनानियों के सूखे होठों पर,
यह बलिदानों से भी ऊँचा साज बना।
1950 में राष्ट्रगीत का गौरव पाकर,
इसने देश में संवैधानिक सम्मान पाया।
यह राष्ट्रगान नहीं, यह देशप्रेम के भाव है,
जिसने स्वतंत्रता की अलख को जगाया।
वंदे मातरम् कहना मात्र शब्द नहीं,
यह कर्तव्य, समर्पण, अभिमान का भाव है।
धरती माँ को नमन व उसकी रक्षा का प्रण
यही वंदे मातरम् का मौलिक सार है।
सुमन बिष्ट, नोएडा



