
यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं है,
अपना यह त्यौहार नहीं है,
है अपनी यह रीत नहीं,
है अपना यह संगीत नहीं।
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा,
जब धरती रूप सजाती है,
सच्ची नूतनता तो बस,
उस हिन्दू नव वर्ष में आती है।
धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा छाया है।
बागों में फूल नहीं खिले,
ना भ्रमरों ने गुंजन गाया है।
सूखी है नदियाँ, प्यासे खग,
पतझड़ का अभी तो साया है।
अभी प्रकृति का श्रृंगार नहीं,
यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं।
है अंधकार की छाया अभी,
अभी सूरज की लाली नहीं।
खेतों में फसलें कच्ची हैं,
अभी आई खुशहाली नहीं।
कोयल की कूक सुनाई दे,
ऐसी अभी हरियाली नहीं।
मन में उल्लास की धार नहीं,
यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं।
जब चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा,
धरती पर खुशियाँ लाएगी।
जब मंद पवन के झोंकों से,
कलियाँ खिल-खिल मुस्काएंगी।
जब नवजीवन की मधुर सुगंध,
सबके मानस को महकाएगी।
होगा अपना नव वर्ष वही,
वही हमें है स्वीकार सही।
रीना पटले शिक्षिका
शास हाई स्कूल ऐरमा, कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश


