साहित्य

आज को देखता हूं तो

डॉ रामशंकर चंचल

आज को देखता हूं
तुम अक्सर मैं परेशान
रहता हूं
क्या यही जीवन है
नौकरी करो
शादी ब्याह कर
बच्चे पैदा करते हुए
मौज मत और आनन्द ले
जीवन व्यतीत करें
यह सब कुछ
वो अपने बच्चों को
दे जाते है
क्या ये जीवन है
जिसका पूर्ण समर्थन करते हुए
आज जी रहा हूं
मकान , धन्, दौलत
गाड़ी, बंगला के साथ
सुख सुकून महसूस करता
सोच हैरान रहते हुं
क्यों नहीं दुनिया
समझती है
जीवन यही नहीं है
जो जीया जा रहा है
जीवन वह भी है जो
सबसे अलग हो
सबसे भिन्न हो
अपना हो
अपनी सोच और चिंतन के साथ हो
कुच न्याय हो
ताकि हम कुछ तो
नया, सुकून ,प्रेरणा
दे सकें आनेवाले कल को
पर मेरे यही सोचना
मेरे तक सीमित रह जाता हैं
की कि चंद लोगो के सिवा
अथाह भीड़ यही
जीवन जी थी है
उन्हें यह बातें
किसी पागल की
बात सी लगती हैं और
मजाक बना चल देता है
खैर साहब
धर्म राजनीति की
बैसाखियों के सहारे
चलता हुआ यह आज है
ज्यादा बोलूंगा तो
लाखों का दुश्मन हो गया
यह समझो
प्रणाम इस आज के
जीवन को
भविष्य को नकारता हुआ
कल की चिंता से मुक्त
बेमतलब जिंदगी जीने में
लगा हुआ
ख़ुद को
अपाहिज करता हुआ
यह आज है
सतत् प्रणाम करता हूं
बातें बहुत ही
कड़वी है पर
जानता हूं
सत्य है और
स्वीकार भी नहीं किया जायेगा
क्यों कि फिर वही बात
सभी तो इसे जीवन
समझ रहे
कविता लिखना चाहते नहीं थे
पर किसी अच्छे विद्वान ने
मुझे से निवेदन किया
चंचल जी
जीवन क्या है
यही जो सदियों से
जीया जा रहा
उनका जवाब दे
खुद के मन को
हल्का महसूस कर रहा हूं

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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