
आख़िर आजकल पढ़ता कौन है, सब अपनी धुन में गाते हैं,
शब्दों के मेले में लेकिन, अर्थ कहाँ सभी रह जाते हैं।
हर हाथ में कलम तो दिखती, हर मन कवि कहलाता है,पर दूसरों की पंक्तियों में तोकौन कौन मन रमाता है?
अपनी रचना ही चाँद लगती,औरों की धूप धुंधली सी,
तालियाँ खुद को ही दे देते, सुनवाई रहती अधूरी सी।
पन्नों से ज्यादा स्क्रीनें हैं, आँखें स्क्रॉल में खोई हैं,
पुस्तक की खुशबू से दूरियाँ, आदतें नई हो गई हैं।
सुनने का धैर्य घटा यहाँ, बोलने का शोर बढ़ा है,
हर कोई मंच सजाए बैठा, पर श्रोता कहाँ खड़ा है!
फिर भी उम्मीद की लौ कहती शब्द अभी मरते नहीं,
जो मन से मन तक जाएँ, वो गीत बिखरते नहीं।
आओ फिर से पढ़ना सीखें, सुनना भी अभ्यास बने,
तभी सृजन का अर्थ खिलेगा, तभी साहित्य सुवास बने।
आख़िर आजकल पढ़ता कौन है — ये प्रश्न हमें जगाता है,
जब पढ़ने वाला जन्मेगा, तब लेखक भी मुस्काता है।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




