
उजाला सामने होगा,
अभी तो भोर बाकी है।
मिलेंगी मंजिले निश्चित,
अभी तो छोर बाकी है।
मिलेंगी शांत सागर में
ही, चिंगारी कयामत की,
कि लहरों की रवानी में,
अभी तो शोर बाकी है।
सौगातों की बारीशें,
बरसना है अभी बाकी,
तेरी मेहनत लगन की तो,
घटा घनघोर बाकी है।
निराशा उस तरफ देखी,
है तूने, जानता हूँ मैं,
मगर आशा की लौ देखो,
अभी इस ओर बाकी है।
✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।



