साहित्य

मोहब्बत-भरी तकरार की

कुलदीप सिंह रुहेला

मेरी खबर तुम भी रखते हो
मुझसे मोहब्बत करते हो
दूसरी पर नजर रखते हो
फिर कहते हो बस तुमसे ही डरते हो”

मेरी हँसी में तुम बसते हो,
मेरे ग़म में भी दिखते हो,
पास न आकर दूर खड़े
चुपके से दिल को पढ़ते हो।

रूठूँ तो तुम मनाते हो,
हँसू तो संग मुस्काते हो,
लेकिन इन निगाहों का क्या
जो हर तरफ भटक जाते हो।

मैं जलती हूँ, तुम हँसते हो,
फिर बाहों में भर लेते हो,
ये कैसी उलझी सी चाहत
लड़ते हो फिर भी कहते हो।

तकरारों में भी प्यार छुपा,
इंकारों में इकरार छुपा,
ये रिश्ता है कुछ ऐसा
जिसमें हर वार में दुलार छुपा।

कभी शिकवा, कभी शिकायत,
कभी नज़रों की शरारत,
झगड़ों में भी मिल जाती है
चुपके से दिल की इबादत।

मेरी खबर तुम भी रखते हो,
मुझसे मोहब्बत करते हो,
दूसरी पर नजर रखते हो
फिर भी मुझ पर ही मरते हो !

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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