
खतम हुई गर्माहट सारी,पहले वाला प्यार नहीं।
रिश्तेदारों तक को देखो,रिश्तों पर ऐतबार नहीं।।
जो रहते थे हरदम हाजिर,वे भी राह बदलते हैं।
बुरे दिनों में साथ न छोड़े,ऐसा कोई यार नहीं।।
पहुँच रहे वर्चुअल निमंत्रण,हल्दी वाला कार्ड नहीं-
बात दिखावे तक आ पहुँची,पहले सा व्यवहार नहीं
औलादें भी कहाँ मानती,बात बड़ों की मनबढ़ हो-
अंग्रेजी से हिंदी जैसा,होता है संस्कार नहीं।।
माई का भी नाम बदलकर,जबसे माम हुआ यारों-
जो माई से मिलता था,वो दाई में प्यार नहीं।।
हर कोई स्वच्छंद घूमता,कौन किसी की मान रहा-
सच तो है कि भाई पर भी,भाई का अधिकार नहीं।।
– डॉ.उदयराज मिश्र




