आलेख

आधुनिकरण की दौड़ में दम तोड़ता संस्कार

शशि कांत श्रीवास्तव

आज के समय में आधुनिकरण की दौड़ में देश विकास की ऊँचाइयों की ओर जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है… उतनी शायद आज से बीस साल पहले नहीं था |
देश में आज हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पहले की अपेक्षा ज्यादा है और आज की महिलायें भी देश के विकास में अपना पूर्ण योगदान दे रहीं हैं…, जहाँ ये गर्व की बात है वहीं आज की पीढ़ी में लड़कियाँ जहाँ हर तरह की पाबंदी से मुक्त स्वछंद उड़ान भर रही हैं वह देखकर अच्छा लगता है पर उससे ज्यादा दुःख तब होता है जब वो अपना संस्कार भूलती जा रही हैं… इसमें वो अपना शान समझती है, मानों संस्कारों को ठेंगा दिखाकर वो क्या साबित करना चाहती हैं…?
“जहाँ एकतरफ विदेशों में लोग हमारी संस्कृति और संस्कारों को शान से अपना रहे हैं… वहीं आज के हमारे बच्चे उसी संस्कृति और संस्कारों को दकियानूसी कहकर मानने से साफ मना करते हैं…! ”
इसे कहाँ की और कौन से स्तर की समझदारी कही जाएगी..,इसमें किसका दोष दिया जायेगा..समाज का या आज की आधुनिक विचारधारा का या फिर माता पिता की परवरिश का….???
जो की अपने बच्चों की परवरिश और शिक्षा तो उच्च स्तर की दिलाते हैं पर बच्चों को संस्कार का बेसिक्स भी नहीं दिलाते…. इसमें दोष किसका है… स्कूल का या घर का..,
क्योंकि आज के स्कूलों में तो इन सबसे कुछ मतलब नहीं है… उन्हें तो केवल कमाई से मतलब से… और आज के पेरेंट्स को तो ये जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है की उनका बच्चा स्कूल में क्या सीख रहा है… बस उन्हें तो इस बात की खुशी रहती है की बच्चा जितनी देर स्कूल में है कम से कम घर में शांति तो है….,जबकि बच्चों में संस्कार के बीज घर में बोये जाते हैं… ना कि स्कूल में |

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

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