
अपने रंग में कान्हा रंग दो करदो मुझे निहाल।
विषय वासना में मैली रहती बहुत हुई बिहाल।।
लोभ- मोह माया का बंधन है जग का जंजाल।
इस बंधन से मुक्त करो अब तो करो रिहाल।।
धन वैभव में मन बस जाता चलती बेढंगी चाल।
मनसुरभित हो जाता दुख मे कौन संभाल।।
श्याम रंग में चूनर रंग दो कृपा करो कृपाल।
जीवन प्रेम सुधा रस बरसे कर दो मालामाल।।
पाप गठरिया सिर पर बंधती हो गई में कंगाल।
मैं अज्ञानी कुछ न जानी ज्ञान से करना तिहाल।।
आन पड़ी चरणों में अब जीवन मेरा संभाल।
भव सागर से पार करो अब तो मुझे हरहाल।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




